Consistency-यानी की निरंतरता की कमी क्यों होती है ?

कंसिस्टेंसी

कंसिस्टेंसी क्यों नहीं रहती हमारे किसी भी गोल में? कोई भी गोल – चाहे वह डाइट हो, पढ़ाई का हो, कोई नई आदत – लिखना हो, रिसर्च करना हो, अपने बिज़नेस के लिए material इकट्ठा करना हो, strategies apply करनी हों, portfolio बनाना हो, रोज़ job applications भेजनी हों – या फिर कुछ आदतें छोड़नी हों जैसे बार-बार मोबाइल देखना, सिगरेट, शराब, सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाना, एक्सरसाइज करना, जिम जाना – यह सब कुछ हो सकता है। सबकी प्राथमिकता अलग होती है, पर 99% लोग कुछ दिन तो करते हैं और फिर छोड़ देते हैं। कभी सोचा है आखिर ऐसा क्यों होता है?

क्या आपने ध्यान दिया है कि आप बाकी काम तो लगातार करते रहते हैं – रोज़ मोबाइल देखते हैं, फालतू की फनी रील्स देखते हैं, आर्टिकल और न्यूज पढ़ते हैं, फोन पर लगातार बातें करते हैं – फिर अपने गोल्स के लिए काम क्यों नहीं करते लगातार? क्यों टूट जाती है हमारी कंसिस्टेंसी?

मैं बताता हूँ। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम टेम्पररी प्लेज़र्स के आदी हो गए हैं। और हमारी कंसिस्टेंसी जो हमें लॉन्ग टर्म बेनेफिट देती है, वह दिमाग को इतनी जल्दी जरूरी नहीं लगती। दिमाग हमेशा आज में जीना चाहता है – लगता है, “अभी मज़ा कर लो, बाद में सोचेंगे।”

मुझे भी ऐसा ही लगता था कई सालों तक – “कोई नहीं आज मिस हो गया न कोई नहीं, कल कर लूँगा। आज थक गया हूँ, आज मूड खराब है, आज नींद आ रही है, आज बहुत सारा काम है।” पर हाँ, इंटरनेट सर्फिंग के लिए कोई बहाना नहीं था – बस कभी भी कर लेता था, दिन में कितनी भी बार।

तो अगर आपकी भी यही आदत है कि आप अपने गोल के लिए रोज़ एक काम नहीं कर रहे और उसमें कई दिनों का गैप आ जाता है, तो समझ जाइए – लाइफ में आप सफल नहीं हो सकते क्योंकि आपके अंदर डिसिप्लिन नहीं है। सफल होने से मेरा मतलब है कि उस चीज़ को रोज़ करने की सफलता।


मेरी personal tips – कंसिस्टेंसी के लिए

गोल कोई भी हो सकता है, इसलिए मैं उसका नाम नहीं लिखूंगा। यह tips मैं खुद अपनाता हूँ और काफी असरदार हैं:

  1. 21 दिन की habit building:
    किसी भी काम को रोज़ सिर्फ 21 दिन तक करें – वह आपकी habit बन जाएगी। जैसे किसी छोटे बच्चे को मोबाइल खिलौना की तरह 21 दिन तक दीजिये, यकीन मानिए अगर आपने उससे अगले नहीं दिया तो वो हंगामा कर देगा। यह थी Negetive habit building पर Positive habit building भी उसी तरह से काम करती है, एक काम को रोज़ करने से वह आदत बन जाता है।
  2. काम को बोरिंग या इंटरेस्टिंग मत मानो:
    कोई भी काम inherently बोरिंग या इंटरेस्टिंग नहीं होता। अपना interest उसमें खुद जगाना पड़ता है। रोज़ सुबह पार्क जाना भी enjoyable लग सकता है अगर आप सिर्फ रिज़ल्ट के लिए नहीं एक अच्छी आदत बनाने के लिए जा रहे है, रिज़ल्ट तो अपने आप दिखने ही लगेंगे जैसे – भूख सही लगना, ऊर्जा बढ़ना, थकान कम होना। पर यह रिज़ल्ट दिखने के लिए कंसिस्टेंसी जरूरी है।
  3. इंस्टेंट रिज़ल्ट की सोच छोड़ो:
    हम काम इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि हमें जल्दी रिज़ल्ट चाहिए। किसी भी काम को इसलिए मत करो कि बड़ी सफलता मिलेगी। बस इसलिए करो क्योंकि आपको लगता है कि वह आपके लिए जरूरी है।
  4. सफल लोगों की नकल मत करो:
    दुनिया के सफल लोगों को देखकर हम short-term प्रेरणा के लिए कुछ दिन उनका रूटीन (अगर पता है तो) follow कर सकते हैं, लेकिन असली चुनौती है इसे बिना किसी तुरंत इनाम के लगातार करना। हम सोचते हैं – जब मन करे तभी करूँ और success भी मिल जाए। भाई ऐसा नहीं होता, सक्सेस वर्ड को तो दिमाग से अलग ही रखो अगर कंसिस्टेंसी पर फोकस करना है।
  5. काम को एन्जॉय करो, रिज़ल्ट के लिए नहीं:
    मैं पिछले 20 साल से रोज़ running के लिए पार्क जाता हूँ। वजन stable है, slim-trim नहीं हूँ, लेकिन running करके मुझे अच्छा feel होता है दिनभर। अगर मैं सोचकर पार्क जाता कि slim हो जाऊँगा, तो 4 दिन में ही running छोड़ देता, 20 साल तक नहीं continue करता। आपका Focus अपने process पर होना चाहिए, result पर नहीं, कभी भी नहीं।
  6. कंसिस्टेंसी मुश्किल नहीं है:
    बहुत लोग सोचते हैं कि कंसिस्टेंसी करना मुश्किल है। मेरा अनुभव है – यह उल्टा आसान है। बस रोज़ बिना रिज़ल्ट की उम्मीद के काम करते जाइए। फल मिले न मिले आप consistent हो जायेंगे, बाकी जितना फल मिलना है वो तो ऊपर वाले के हाथ में है।

आखिरी बात

कंसिस्टेंसी में प्रॉब्लम आए तो घबराना मत। दुनिया तो कुछ नहीं बोलती जब आप कोई काम रोज़ करते हो। बस आप अपनी आदतें दूसरों से compare करने लगते हो – “की यार यह बंदा तो मेरी तरह रोज़ मेहनत नहीं कर रहा, पर फिर भी उसकी life chill में चल रही है, मैं क्यों परेशान हो रहा हूँ एक काम को रोज़ करके।” और यही trap है, मत compare करना। मोबाइल उठा कर दुनिया की तरह बेवकूफ बनकर pleasure लेना बहुत ही टुच्चा और बेकार सोच है, लेकिन अपने गोल पर focus रखना एक समझदारी भरा निर्णय है।

सफलता मिले या नहीं, अच्छी आदत तो बन जाएगी। और ये अच्छी आदत और कई अच्छी आदतों की शुरुआत हो सकती है जैसे कि digital detox, focus improvement, productivity, को आपकी जिंदगी का एक हिस्सा बना देना और आपको उन्हें पाने के लिए कोई extra effort ना करना पड़े।

By focuskar

मैं अमित जोशी, एक साधारण इंसान हूँ जो कभी इंटरनेट की लत (Internet Addiction) में उलझा हुआ था। अब अपनी डिजिटल डिटॉक्स यात्रा और अनुभवों के ज़रिए दूसरों को सजग जीवन (Mindful Living) और एकाग्रता (Focus) की राह दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ। आप अपने अनुभव मुझसे साझा करना चाहें तो मुझे इस ईमेल पर लिख सकते हैं: amitjoshig@gmail.com

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